काशी के इस मंदिर में होती हैं Subhas Chandra Bose की पूजा, जानें क्यों हैं खास

Subhas Chandra Bose Mandir: नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन 23 जनवरी को प्रतिवर्ष ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। नेताजी युवाओं के प्रेरणास्रोत रहे हैं। उनका जीवन आज भी युवाओं को देशसेवा के लिए प्रेरित करता है। आजादी की लड़ाई में भारत माता की सेवा में अपना जीवन न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों को हर भारतवासी अपने दिल में जगह देता है। यही वजह है कि ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ इंसान होते हुए भी ईश्वर हो गए है।

दरअसल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चाहने वालों ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही के इंद्रेश नगर में उनका एक मंदिर बनवा रखा है। यह मंदिर दुनिया के 15 देशों के सुभाषवादियों की आस्था का प्रतीक हैं। इसे ‘सुभाष मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां कपाट भारत माता की प्रार्थना से खुलते हैं और सुभाष आरती के बाद बंद होते हैं। मंदिरों के शहर काशी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रदेवता के रूप में पूजे जाते हैं।

सुभाष मंदिर में क्या हैं खास?

  • 11 फीट ऊंचे सुभाष मंदिर की सीढ़ियां लाल रंग (क्रांति का रंग) की हैं।
  • सीढ़ियों से चढ़कर आधार चबूतरा सफेद रंग (शांति का रंग) का है।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति काले रंग (शक्ति का प्रतीक) की है।
  • मंदिर का छत्र स्वर्ण के रंग (सुनहरा छत्र) का है।

नेताजी का ‘सुभाष मंदिर’ हमें सन्देश देता है कि शांति के आधार पर ही शक्ति की पूजा होती है। शक्ति की पूजा से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

किसने की सुभाष मंदिर की स्थापना?

बीएचयू के इतिहास विभाग के प्रो. डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने इस मंदिर की स्थापना की थी। वह बताते है कि उनका उद्देश्य छुआछूत, धर्म, जाति, रंग, लिंग, भाषा के भेद को खत्म कर सांप्रदायिक एकता स्थापित करने एवं देशभक्ति का पाठ पढ़ाना हैं। महिलाएं, पुरुष, किन्नर सभी यहां पर दर्शन करने आते हैं।

सुभाष मंदिर में प्रार्थना और आरती

  • सुबह 7 बजे भारत माता की प्रार्थना के साथ कपाट खुलते है।
  • शाम 7 बजे से पहले आजाद हिंद सरकार का राष्ट्रगान गाया जाता है।
  • फिर पांच बार राष्ट्रदेवता को जय हिंद के साथ सलामी दी जाती है।
  • इसके पश्चात महाआरती होती है।

महाआरती के बाद सभी दर्शनार्थी मंदिर की महिला पुजारी ‘खुशी रमन भारतवंशी’ के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। राष्ट्रदेवता नेताजी को दंडवत करते हैं और मंदिर के संस्थापक डॉ. राजीव श्रीवास्तव को भी दंडवत प्रणाम करते हैं। आरती और प्रसाद पाने के बाद मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है।

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मंदिर में है दलित महिला पुजारी

दलित परिवार की होनहार बेटी खुशी रमन भारतवंशी को पूरे विधि विधान से मंदिर का पुजारी नियुक्त किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंद्रेश कुमार, महंत बालक दास, अयोध्या श्रीराम पीठ के मुख्य महंत शंभू देवाचार्य के साथ 21 वैदिक ब्राह्मणों ने सुभाष मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करवाई थी। बता दें खुशी रमन चिल्ड्रेंस पार्लियामेंट की स्पीकर रह चुकी हैं और हाई स्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है।

मनाया जाता है सुभाष महोत्सव

मंदिर में नेताजी Subhas Chandra Bose के जन्मोत्सव को 21 जनवरी से 26 जनवरी तक सुभाष महोत्सव के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। नेताजी में आस्था रखने वाले लोग देश-विदेश से दर्शन करने यहां पहुंचते हैं। 21 अक्तूबर को आजाद हिंद सरकार के स्थापना दिवस पर प्रतिवर्ष सुभाष मंदिर में विशेष दर्शन होता है।

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