काफी संघर्ष भरा रहा है देश की इन 4 महिला एथलीट्स का जीवन, जानकर रह जाओगे दंग

आज लड़कियां और महिलायें किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है। बात करें खेल जगत की तो यहां भी महिलाओं ने अपनी भागीदारी से देश का नाम विश्वभर में रोशन किया है। कड़े संघर्ष और जीवन में काफी अवहेलनाओं का सामना करने के बाद पहचान बनाने वाली देश की कुछ ऐसी महिलाएं है, जिनकी कहानी हमारे जीवन में प्रेरणा का काम करेगी। इसी कड़ी में आज हम देश की उन बेटियों के संघर्ष पर बात करेंगे, जिन्होंने खेल जगत में तिरंगे का मान बढ़ाया है।

Rani Rampal

रानी रामपाल

भारतीय महिला हॉकी टीम की शान है रानी रामपाल। बेहद कम उम्र में देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेलने वाली रानी का जीवन सफर आसान नहीं रहा है। जब वह पांचवी क्लास में पढ़ती थी, तभी से उनकी हॉकी खेलने में रूचि जागृत होने लगी थी। समय के साथ-साथ रानी बड़े लेवल पर खेलने का सपना देखने लगी थी। लेकिन उनके पिता घोड़ा चलाकर जीवन-बसर किया करते थे, ऐसे में रानी की हॉकी जरूरतों को पूरा करना उनके लिए आसान काम नहीं था। इसके बावजूद रानी के पिता ने बेटी के सपनों को उड़ान देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्हें हमेशा आगे खेलने के लिए प्रोत्साहित किया।

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हिमा दास

एथलेटिक्स में भारत का जाना-माना चेहरा बन चुकी हिमा दास का करियर सफर भी संघर्षों से भरा रहा है। आज वह जिस मुकाम पर है, उसके पीछे उनका कड़ा परिश्रम, लगन और साहस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। एक साधारण किसान परिवार की बेटी हिमा बचपन में लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थी। उस समय वह अपनी तेजी से लड़कों को भी छकाने में कामयाब हो जाती। समय बदला और हिमा ने कोच निपोन की सलाह मानते हुए रेसिंग में खुद को आजमाया और सफल हुई। एशियन गेम्स में सिल्वर जीतकर उन्होंने जो इतिहास रचा, उसकी वजह से आज उनकी करोड़ों रुपये की ब्रांड वैल्यू बन चुकी है।

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मैरी कॉम

आमतौर पर बॉक्सिंग के खेल को महिलाओं के लिए उचित नहीं माना जाता। लेकिन इन सभी बातों को दरकिनार करते हुए मैरी कॉम ने ना सिर्फ इस खेल को करियर बनाया बल्कि छः बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव भी हासिल किया। मैरी कॉम का यहां तक का सफर आसान नहीं रहा है। उनका बचपन घर के काम और खेती करने में बीता। इसी दौरान वह अपने छोटे भाई-बहनों का भी ख्याल रखती और बॉक्सिंग का अभ्यास भी करती। बॉक्सिंग के प्रति उनके प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, उन्होंने अपने अंतिम 2 विश्व चैंपियनशिप मेडल और ओलंपिक पदक 35 की उम्र में मां बनने के बाद जीते।

Geeta Phogat

गीता फोगाट

देश में पहलवानी में महिलाओं की भागीदारी की बात जब भी होती है तो, सबसे पहले गीता फोगाट का नाम जबां पर आता है। एशियन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली गीता आज के समय में देश की सबसे सफल महिला पहलवान है। बॉलीवुड फिल्म ‘दंगल’ उनकी कुछ सफलताओं की कहानी को बेहद अच्छे से बयां करती है। गीता ने इस मुकाम को पाने के लिए काफी संघर्ष किये है, जब उनकी उम्र गुड्डे-गुड़ियों से खेलने की थी। ऐसे समय में उनके पहलवान पिता महावीर फोगाट ने उन्हें दंगल में उतार दिया। लड़की के कुश्ती करने पर गांव वालों की आलोचनाओं का सामना भी उन्हें जीवन में करना पड़ा।


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