डर्टी पॉलिटिक्स: अपने दिमाग पर स्वार्थी मकडियों को जाल बनाने से रोकिये

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जब जब आजादी मिलने की खुशी का बेतहाशा इंतजार कर रहे बच्चों की आनंदित मुस्कान का दिन हो या हो सविधान लागू होने का उल्लास , मानसिक सोच से विकृत साथियों के कुछ गुट सक्रिय हो जाते हैं जिनमें अच्छे और बुरे की पहचान करने की बौद्धिक शक्ति विकसित होने लगती हैं। सोशल साइट्स के माध्यम से देशप्रेम उजागर करने वाले साथियों की संख्या भी यहाँ बहुत अधिक है, जो शायद वहीँ तक ही सीमित हो। 



गंदी राजनीति के पशोपेश में लपेटे जा रहे आप 

आजादी तो हमें मिल गई लेकिन शायद कुछ साथियों की सोच अभी पूर्णतया विकसित नहीं हो पायीं है। कहने को देश सन -47 में आजाद तो हो गया, लेकिन कहीं न कहीं हम आजादी के उन रणबांकुरो के त्याग और परिश्रम के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं। एक छत के नीचे आनंद की अनुभूति लेने वाले आप और हम लोग भूल जाते हैं की हमे इस गन्दी राजनीती के पशोपेश में लपेटा जा रहा हैं। हम तुलना करने लगते हैं गाँधी और नेहरु की और हम तुलना करते हैं भगत और सुभाष की आज की राजनीती से जुड़े कुछ कथित जनसेवकों के साथ।

नेहरू और गाँधी को देशद्रोही साबित करने का हक हमें नहीं 

नापसंद आने पर विरोध करना सर्वथा उचित हैं किन्तु इतिहास की आज के साथ तुलना सर्वथा अनुचित ही होगी । हमे कोई हक नहीं की हम नेहरू के चरित्र पर बात करे या फिर गाँधी को देशद्रोही साबित करने का प्रयास करें। किताबों की दुनिया से रटी विध्या से उनके चरित्र का फैसला मत कीजिये जिनके त्याग से पहले शायद हमे माँ के पेट में अठखेलियाँ करने का सौभाग्य भी प्राप्त न हो सका था। समय हर वक्त एक सामान नहीं हो सकता यह समझना भी जरुरी हैं। 

मुश्किल हैं किसी गरीब के घर खुशियों के दिये जलाना

अगर किताबी ज्ञान ही पूर्णतया उचित होता तो हमें नहीं सिखाया जाता कि, जनता के मतों से उनकी सर्वसहमति से चुना गया व्यक्ति की जनता का नेता होता है। इस पंक्ति को वर्तमान की सरकार के मंत्रिमंडल में व्यवस्तिथ करके देखिये अनुमान हो जायेगा। यह समझना अति आवश्यक हैं ‘कमियां निकालकर कष्ट देना आसान हैं , मुश्किल हैं किसी गरीब के घर खुशियों के दिये जलाना। 

किसी की सगी नहीं होती राजनीति, स्वार्थ पूरा होते ही छोड़ देगी 

बार बार यही कहूँगा की साथियों इस गंदी राजनीती के चंगुल में इसी तरह फंसे रहे तो जिंदगी की बर्बादी पर ये नेता प्रेम और ये पार्टी जिनका मोबाइल एसएमएस से आप सदस्यता लेकर स्वयं को जननायक समझने लगे हो अथवा अत्यधिक शक्तिशाली होने का अनुभव महसूस करने लगे हो , कहीं काम नहीं आयेंगे क्यूंकि पूर्वजों ने कहा हैं ‘राजनीती किसी की सगी नहीं होती, उसका स्वार्थ पूरा होते ही वो आपको छोड़ देगी। 



दिमागी इन्द्रियों को राजनीती की मकड़ियों से बचाये 

फैसला आपका है, नहीं तो हम इस समुंदर की लहरों के साथ चलते रहे हैं और चलते रहेंगे अर्ताथ जिन्दगी हैं समय के साथ परिवर्तन होते रहेंगे । लेकिन हमे प्रयास करते रहना होगा की हमारी दिमागी इन्द्रियों पर राजनीती की मकड़ियाँ जाल न बिछा पाए ।

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