चुनावी प्रचार: सौदागर बन गए वो लोग जिन्हें पथ प्रदर्शक बनना था
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राजनीतिक गलियों में चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी हैं। परिणाम आते ही वोट बैंक के साथ चेहरे भी बदल गए। हो सकता हैं कुछ जनता भी इधर-उधर हो गई हो। लेकिन अगर कुछ नहीं बदलेगा तो वो हैं चुनावी प्रचार में बदसूरत होती दीवारें और बदरंग होते दिशा अथवा पथ सूचक। ऐसा बिल्कुल नहीं हैं की इन बदरंग दीवारों या सूचकों को बदला नहीं जा सकता। लेकिन इन जनसेवकों की चुनाव प्रचार की स्वाभाविक सोच को कैसे बदला जाए जो जंग लग चुकी है।
शहर का हर चप्पा चप्पा चुनावी पोस्टरों से अटा
अब कुछ ही समय पश्चात् मुख्य विधानसभा चुनाव भी आयोजित होने हैं। आपके और मेरे घर की गलियां और शहर का हर चप्पा चप्पा आपको चुनावी पोस्टरों से अटा मिलेगा । और शायद कहीं अपवाद स्वरुप कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि पिछले चुनावों के पोस्टर्स के अवशेष नजर आ जाए । नव वर्ष और मकर सक्रांति के बधाई संदेश अभी मिटे भी नहीं होंगे जहाँ शीघ्र ही होली के बधाई संदेश भी नजर आने लगेंगे।
पथ प्रदर्शक बनना था लेकिन देश के सौदागर बन बैठे
राजनीती के सीनियर्स जब बेतरतीब आदतों का शिकार हैं तो जूनियर्स से क्या अपेक्षाएं रखी जा सकती हैं। सरकारी विश्वविद्यालय के चुनावी कैम्पेन में हमें छात्र राजनीती की धुरी बनने की चाहत रखे छात्र सीनियर नेताओं की पूरी अनुपालना करते नजर आते हैं। अब जूनियर्स का क्या दोष वो तो वहीँ करेंगे न जैसा उन्हें दिखाया जायेगा । लेकिन श्राप हैं गणतंत्र पर ये जिन्हें पथ प्रदर्शक बनना था वो देश के सौदागर बन बैठे हैं।
देश को चुनावी प्रचार में बदलाव की जरुरत
स्वच्छ भारत की मुहिम लिए चल रहा देश और ये राजनीतिक दल अगर चुनावी प्रचार के तरीकें में बदलाव ला सके और पेपर रहित कैम्पेन करा सके तो शायद सही मायनो में भारत स्वच्छ होगा। यदि पेपर रहित प्रचार बना सके तो शायद एक नहीं कई सकारात्मक कार्यो को अंजाम दे पायेंगे। जरुरी हैं प्रशासनिक स्तर पर जागरूकता फैलाने कि, यदि यह संभव हो सका तो राजनीती के प्रचार में तो बदलाव आएगा ही और साथ ही हम जनता में स्वच्छ्ता के प्रति सही मायनों में एक मजबूत सन्देश पंहुचा पाएंगे।
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यह भी पढ़े: डर्टी पॉलिटिक्स: अपने दिमाग पर स्वार्थी मकडियों को जाल बनाने से रोकिये
राजनीतिक गलियों में चुनावी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी हैं। परिणाम आते ही वोट बैंक के साथ चेहरे भी बदल गए। हो सकता हैं कुछ जनता भी इधर-उधर हो गई हो। लेकिन अगर कुछ नहीं बदलेगा तो वो हैं चुनावी प्रचार में बदसूरत होती दीवारें और बदरंग होते दिशा अथवा पथ सूचक। ऐसा बिल्कुल नहीं हैं की इन बदरंग दीवारों या सूचकों को बदला नहीं जा सकता। लेकिन इन जनसेवकों की चुनाव प्रचार की स्वाभाविक सोच को कैसे बदला जाए जो जंग लग चुकी है।
शहर का हर चप्पा चप्पा चुनावी पोस्टरों से अटा
अब कुछ ही समय पश्चात् मुख्य विधानसभा चुनाव भी आयोजित होने हैं। आपके और मेरे घर की गलियां और शहर का हर चप्पा चप्पा आपको चुनावी पोस्टरों से अटा मिलेगा । और शायद कहीं अपवाद स्वरुप कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि पिछले चुनावों के पोस्टर्स के अवशेष नजर आ जाए । नव वर्ष और मकर सक्रांति के बधाई संदेश अभी मिटे भी नहीं होंगे जहाँ शीघ्र ही होली के बधाई संदेश भी नजर आने लगेंगे।
पथ प्रदर्शक बनना था लेकिन देश के सौदागर बन बैठे
राजनीती के सीनियर्स जब बेतरतीब आदतों का शिकार हैं तो जूनियर्स से क्या अपेक्षाएं रखी जा सकती हैं। सरकारी विश्वविद्यालय के चुनावी कैम्पेन में हमें छात्र राजनीती की धुरी बनने की चाहत रखे छात्र सीनियर नेताओं की पूरी अनुपालना करते नजर आते हैं। अब जूनियर्स का क्या दोष वो तो वहीँ करेंगे न जैसा उन्हें दिखाया जायेगा । लेकिन श्राप हैं गणतंत्र पर ये जिन्हें पथ प्रदर्शक बनना था वो देश के सौदागर बन बैठे हैं।
देश को चुनावी प्रचार में बदलाव की जरुरत
स्वच्छ भारत की मुहिम लिए चल रहा देश और ये राजनीतिक दल अगर चुनावी प्रचार के तरीकें में बदलाव ला सके और पेपर रहित कैम्पेन करा सके तो शायद सही मायनो में भारत स्वच्छ होगा। यदि पेपर रहित प्रचार बना सके तो शायद एक नहीं कई सकारात्मक कार्यो को अंजाम दे पायेंगे। जरुरी हैं प्रशासनिक स्तर पर जागरूकता फैलाने कि, यदि यह संभव हो सका तो राजनीती के प्रचार में तो बदलाव आएगा ही और साथ ही हम जनता में स्वच्छ्ता के प्रति सही मायनों में एक मजबूत सन्देश पंहुचा पाएंगे।
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